भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने निवेशकों, रेगुलेटर्स और पूरे कॉर्पोरेट जगत को हिला कर रख दिया है। मामला है Rajesh Exports का, जिस पर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने गंभीर आरोप लगाए हैं।

SEBI का दावा है कि कंपनी द्वारा पिछले पांच वर्षों में दिखाया गया राजस्व (Revenue) वास्तविकता से काफी अलग हो सकता है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भारत के कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े कथित अकाउंटिंग फ्रॉड में से एक हो सकता है।
आखिर मामला क्या है?
SEBI के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच Rajesh Exports ने लगभग 15.44 लाख करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू दिखाया। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि यह दुनिया के कई देशों की सालाना GDP से भी ज्यादा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस रेवेन्यू का लगभग 99% हिस्सा भारत में स्थित लिस्टेड कंपनी से नहीं, बल्कि उसकी विदेशी सहायक कंपनियों (Overseas Subsidiaries) से आया बताया गया है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम है Valcambi SA, जो स्विट्जरलैंड की एक गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी है। Rajesh Exports ने इसे कई साल पहले अधिग्रहित किया था और यह कंपनी समूह के अंतरराष्ट्रीय कारोबार का मुख्य आधार मानी जाती है।
SEBI को कहां मिली गड़बड़ी?
जांच के दौरान जब ऑडिटर्स ने Valcambi SA और अन्य विदेशी सहायक कंपनियों के रिकॉर्ड्स की जांच की, तो उन्हें बड़ा अंतर दिखाई दिया।
SEBI का आरोप है कि समूह स्तर पर जो रेवेन्यू दिखाया गया, उसे सहायक कंपनियों के रिकॉर्ड्स के जरिए पूरी तरह सत्यापित नहीं किया जा सका। यानी कंपनी द्वारा रिपोर्ट किए गए आंकड़े और उपलब्ध दस्तावेजों में बड़ा अंतर पाया गया।
यही वजह है कि अब कंपनी के पूरे वित्तीय रिकॉर्ड सवालों के घेरे में आ गए हैं।
अफ्रीका में 1,035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी सवाल
रेवेन्यू से जुड़ी कथित गड़बड़ियों के अलावा SEBI ने कंपनी के अफ्रीकी गोल्ड माइनिंग एसेट्स में किए गए 1,035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी सवाल उठाए हैं।
रेगुलेटर यह समझने की कोशिश कर रहा है कि इन निवेशों का वास्तविक मूल्य क्या है और क्या इनके बारे में निवेशकों को सही जानकारी दी गई थी।
प्रमोटर से जुड़े खातों में फंड ट्रांसफर का आरोप
SEBI की अंतरिम जांच में एक और गंभीर आरोप सामने आया है।
रेगुलेटर का दावा है कि कंपनी के कुछ फंड ऐसे खातों में ट्रांसफर किए गए जो प्रमोटर राजेश मेहता से जुड़े हुए थे। इसके बाद कथित तौर पर इन पैसों का इस्तेमाल व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए किया गया।
यदि यह आरोप साबित होता है, तो मामला केवल अकाउंटिंग गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस और निवेशकों के हितों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन जाएगा।
निवेशकों पर क्या असर पड़ सकता है?
इस मामले का असर सिर्फ कंपनी या उसके प्रमोटर्स तक सीमित नहीं है।
देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC के पास Rajesh Exports में लगभग 10.8% हिस्सेदारी है। LIC के निवेश करोड़ों पॉलिसीधारकों के पैसों से किए जाते हैं।
यानी अगर कंपनी पर लगे आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका असर उन लाखों परिवारों पर भी पड़ सकता है जिनकी बचत LIC के जरिए बाजार में निवेश होती है।
SEBI का अनुमान है कि कथित गड़बड़ियों के कारण शेयरधारकों की संपत्ति में लगभग 12,726 करोड़ रुपये तक की कमी आ सकती है।
क्या यह भारत का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट फ्रॉड बन सकता है?
फिलहाल जांच जारी है और SEBI के आरोप अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। कंपनी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।
लेकिन यदि जांच के बाद आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला भारत के इतिहास के सबसे बड़े कथित रेवेन्यू मिसरिप्रेजेंटेशन मामलों में शामिल हो सकता है।
एक समय पर Rajesh Exports को भारत की सबसे सफल ज्वेलरी और गोल्ड एक्सपोर्ट कंपनियों में गिना जाता था। लेकिन अब वही कंपनी देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट विवादों में से एक के केंद्र में खड़ी दिखाई दे रही है।
Rajesh Exports का मामला केवल एक कंपनी की कहानी नहीं है। यह निवेशकों के भरोसे, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और भारतीय बाजार की पारदर्शिता की भी परीक्षा है।
आने वाले महीनों में SEBI की जांच और कंपनी का जवाब तय करेगा कि यह मामला एक गलतफहमी साबित होता है या फिर भारत के कॉर्पोरेट इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला बन जाता है।



